Dehradun: उत्तराखंड की धरती ने अनेक महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, लेकिन पंडित नारायण दत्त तिवारी का जीवन संघर्ष, दूरदृष्टि और जनसेवा की ऐसी मिसाल है, जिससे आज की युवा पीढ़ी बहुत कुछ सीख सकती है। उन्हें सम्मानपूर्वक ‘पर्वत पुत्र’ के नाम से याद किया जाता है। उनका जीवन बताता है कि दृढ़ संकल्प, शिक्षा और निरंतर परिश्रम के बल पर व्यक्ति राजनीति और समाजसेवा में विशिष्ट पहचान बना सकता है।
18 अक्टूबर 1925 को कुमाऊं की धरती पर जन्मे नारायण दत्त तिवारी के पिता पूर्णानंद तिवारी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे। परिवार से मिले देशप्रेम और संघर्ष के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और लगभग 15 महीने जेल में रहना पड़ा।
जिस उम्र में युवा अपने भविष्य के सपने संजोते हैं, उस उम्र में तिवारी जी ने देश की आजादी के लिए जेल की यातनाएं सहीं। उनका यह संघर्ष राष्ट्रप्रेम, साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचायक था।
जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की। वर्ष 1947 में वह विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष बने। यह उपलब्धि उनके नेतृत्व कौशल और राजनीतिक समझ का प्रमाण थी।
वर्ष 1952 में विधायक बनने के साथ उनकी राजनीतिक यात्रा ने नई दिशा पकड़ी। उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, केंद्र सरकार में कई जिम्मेदारियां संभाली और अलग-अलग कार्यकालों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनका राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक कार्यशैली उन्हें देश के प्रमुख नेताओं में विशिष्ट स्थान दिलाने वाले कारकों में शामिल रहे।
उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद नवगठित प्रदेश के सामने रोजगार, औद्योगिक विकास और आर्थिक अवसरों को बढ़ाने जैसी बड़ी चुनौतियां थीं। वर्ष 2002 में नारायण दत्त तिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और 2007 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहित करने और रोजगार के अवसर बढ़ाने के प्रयास किए गए। पंतनगर, रुद्रपुर और हरिद्वार जैसे क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को गति देने की पहल के कारण भी उनके कार्यकाल को याद किया जाता है।
एक ही व्यक्तित्व का उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों राज्यों का मुख्यमंत्री बनना उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा की असाधारण उपलब्धि थी। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय जड़ों से जुड़ा व्यक्ति भी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।
उन्हें ‘पर्वत पुत्र’ क्यों कहा जाता है?
कुमाऊं की धरती पर जन्मे तिवारी जी का जीवन उत्तराखंड की मिट्टी, संस्कृति और यहां के लोगों की आकांक्षाओं से जुड़ा रहा। पहाड़ों से निकलकर देश की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल करने तक का उनका सफर उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
आज उनके जीवन को याद करने का अर्थ केवल अतीत की उपलब्धियों का गुणगान करना नहीं, बल्कि उन सपनों को आगे बढ़ाना भी है, जिनकी आज उत्तराखंड को जरूरत है। युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना, पलायन रोकना, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना तथा गांवों तक विकास पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
युवा पीढ़ी के लिए तीन महत्वपूर्ण सीख
- संघर्षों से घबराएं नहीं, बल्कि उनसे सीख लेकर आगे बढ़ें।
- शिक्षा को अपनी ताकत बनाएं और निरंतर सीखते रहें।
- जनसेवा को केवल पद नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी समझें।
एक युवा स्वतंत्रता सेनानी से छात्रसंघ अध्यक्ष, विधायक, केंद्रीय मंत्री और दो राज्यों के मुख्यमंत्री तक की उनकी यात्रा बताती है कि दृढ़ संकल्प और निरंतर परिश्रम से इतिहास रचा जा सकता है।
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Chief Editor, Aaj Khabar
