Haldwani: उत्तराखंड हाई कोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने के मामले में सामने आई नई जानकारी के बाद सोशल मीडिया पर चल रही खबरों को लेकर स्थिति समझना जरूरी हो गया है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति (REC) ने हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में हाई कोर्ट के नए परिसर के निर्माण के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के हस्तांतरण के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है। हालांकि, इस निर्णय का अर्थ यह नहीं है कि हाई कोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के पूरे प्रस्ताव पर औपचारिक रोक लगा दी गई है या शिफ्टिंग का फैसला हमेशा के लिए रद्द हो गया है।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समिति ने वन भूमि के इस्तेमाल से जुड़े प्रस्ताव पर निर्णय लिया है। उसने वैकल्पिक गैर-वन भूमि की पर्याप्त तलाश नहीं किए जाने पर आपत्ति जताई और राज्य सरकार तथा संबंधित एजेंसी को हाई कोर्ट परिसर के निर्माण के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशने के निर्देश दिए हैं। इसलिए वन भूमि हस्तांतरण के प्रस्ताव को खारिज किए जाने और हाई कोर्ट की शिफ्टिंग की पूरी प्रक्रिया को रद्द किए जाने के बीच अंतर समझना जरूरी है।
क्या है क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति (REC)?
क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति यानी रीजनल एंपावर्ड कमेटी केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत वन भूमि के उपयोग से जुड़े प्रस्तावों की निर्धारित नियमों के अनुसार जांच करती है। वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति देने की प्रक्रिया में यह समिति प्रस्ताव के तकनीकी और नियामकीय पहलुओं की समीक्षा करती है।
उत्तराखंड हाई कोर्ट के मामले में हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र की 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर नए परिसर के निर्माण का प्रस्ताव रखा गया था। चूंकि इसके लिए वन भूमि का उपयोग गैर-वन उद्देश्य के लिए किया जाना था, इसलिए प्रस्ताव को संबंधित पर्यावरणीय और वन संरक्षण नियमों के तहत जांच के लिए समिति के समक्ष रखा गया।
समिति ने पाया कि प्रस्ताव में यह पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया था कि हाई कोर्ट परिसर के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि के दूसरे विकल्पों की विधिवत तलाश की गई है या नहीं। इसी आधार पर प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी गई।
बेलबाबा क्षेत्र के प्रस्ताव में 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के हस्तांतरण की अनुमति मांगी गई थी। प्रस्तावित निर्माण के लिए 123 पेड़ों का कटान भी होना था। समिति ने गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश नहीं होने के कारण प्रस्ताव पर आपत्ति जताई और संबंधित एजेंसी को दूसरे उपयुक्त स्थानों की संभावनाएं तलाशने के निर्देश दिए।
इस निर्णय से फिलहाल बेलबाबा की प्रस्तावित वन भूमि पर हाई कोर्ट परिसर बनाने की योजना को मंजूरी नहीं मिल सकी है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि हल्द्वानी में हाई कोर्ट परिसर बनाने की संभावना ही समाप्त हो गई है।
गौलापार का प्रस्ताव पहले ही हो चुका है खारिज
हल्द्वानी में हाई कोर्ट को स्थानांतरित करने के लिए इससे पहले गौलापार क्षेत्र में भी जमीन का प्रस्ताव सामने आया था। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी 2024 में उस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली थी। उसमें 4,238 पेड़ों के कटान और अन्य प्रावधानों को लेकर आपत्तियां सामने आई थीं।
अब बेलबाबा में 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिलने के बाद दोनों स्थानों से जुड़े प्रस्तावों की स्थिति अलग-अलग समय के फैसलों के संदर्भ में समझी जानी चाहिए। गौलापार के पुराने प्रस्ताव और बेलबाबा के हालिया प्रस्ताव को एक ही समय में लिया गया संयुक्त निर्णय बताना सही नहीं होगा।
क्या अब हाई कोर्ट हल्द्वानी नहीं जाएगा?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि हाई कोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग हमेशा के लिए रद्द हो गई है। क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने वन भूमि के हस्तांतरण के प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार किया है और गैर-वन भूमि तलाशने के निर्देश दिए हैं। यह निर्णय अपने आप में शिफ्टिंग के पूरे प्रस्ताव पर औपचारिक रोक लगाए जाने के समान नहीं है।
आगे की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकार और संबंधित एजेंसी उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशने के लिए क्या कदम उठाती हैं और आवश्यक कानूनी तथा प्रशासनिक मंजूरियां किस प्रकार प्राप्त होती हैं। वन भूमि से संबंधित आपत्तियों का समाधान या वैकल्पिक भूमि की उपलब्धता आगे की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, लेकिन किसी भी विकल्प को मंजूरी मिलना अभी निश्चित नहीं माना जा सकता।
इस पूरे मामले में फिलहाल स्पष्ट तथ्य यह है कि बेलबाबा क्षेत्र की 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के हस्तांतरण का प्रस्ताव खारिज हुआ है और गैर-वन भूमि तलाशने के निर्देश दिए गए हैं। इसे सीधे तौर पर हाई कोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग पर पूर्ण प्रतिबंध या शिफ्टिंग के फैसले के स्थायी रूप से रद्द होने के रूप में प्रस्तुत करना भ्रामक हो सकता है।
हाई कोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना का अंतिम भविष्य क्या होगा, यह आगे होने वाली कार्रवाई और आवश्यक मंजूरियों पर निर्भर करेगा। इसलिए इस मामले से जुड़ी खबरों को पढ़ते समय वन भूमि के प्रस्ताव पर हुए निर्णय और शिफ्टिंग की पूरी प्रक्रिया के बीच अंतर समझना जरूरी है।
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Chief Editor, Aaj Khabar
