॰ 4 घंटे की मैराथन बैठक बेअसर, खुदी पड़ी सड़कों से जनता बेहाल; अब बड़ा सवाल- क्या 2027 चुनाव से पहले सीएम धामी तय करेंगे लापरवाह अफसरों की जवाबदेही?
Haldwani: उत्तराखंड में ‘गड्ढामुक्त सड़कों’ का दावा सिर्फ फाइलों में ही दौड़ रहा है। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आधी रात को 4 घंटे तक प्रदेश भर के डीएम और एसएसपी की मैराथन क्लास ली थी। उस बैठक में सीएम का सख्त आदेश था कि 1 नवंबर तक हर हाल में प्रदेश की सड़कें गड्ढामुक्त हो जानी चाहिए। जनता ने इस आदेश को सुनकर चैन की सांस ली थी कि कम से कम दीपावली के त्योहार पर उन्हें हिचकोले खाते हुए बाजार या रिश्तेदारों के घर नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन धरातल की हकीकत सीएम के दावों और आदेशों को मुंह चिढ़ा रही है।
कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में प्रशासन और संबंधित विभागों ने मुख्यमंत्री के आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ा दी हैं। शहर की सड़कों की हालत इतनी बदहाल है कि वह आमजन को रुला रही है। 1 नवंबर की डेडलाइन बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस हैं।
दीपावली खुशियों का त्योहार है, लोग बाजारों में खरीदारी करने और अपने करीबियों से मिलने निकलते हैं। लेकिन हल्द्वानी की जनता को त्योहारी सीजन में प्रशासन की तरफ से केवल ‘गड्ढे और धूल’ का तोहफा मिला है। शहर में सीवर और पाइपलाइन के नाम पर खोदी गई सड़कें आज भी बदहाल पड़ी हैं। गड्ढों को भरने के नाम पर महज खानापूर्ति की गई है। आलम यह है कि धूल के गुबार और टूटी सड़कों के कारण लोगों का पैदल चलना तक मुहाल हो गया है।

‘मैं खुद दौरा करूंगा’- चेतावनी का भी नहीं दिखा खौफ
हैरानी की बात यह है कि मैराथन बैठक में सीएम धामी ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि “मैं खुद सड़कों का निरीक्षण करूंगा और जहां सड़क खराब मिली, वहां अफसरों की जवाबदेही तय की जाएगी।” इसके बावजूद हल्द्वानी जैसे प्रमुख शहर में अधिकारियों की इस कदर बेरुखी और लापरवाही यह साबित करती है कि उन्हें मुख्यमंत्री के आदेशों का कोई खौफ नहीं है।

हल्द्वानी की बदहाल सड़कें एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं। अगर कुमाऊं के सबसे बड़े व्यापारिक और रिहायशी केंद्र का यह हाल है, तो प्रदेश के सुदूर और पर्वतीय इलाकों में ‘गड्ढामुक्त अभियान’ का क्या हश्र हुआ होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। क्या अधिकारियों ने केवल कागजों पर ही प्रदेश को गड्ढामुक्त कर दिया है?
गौर तलब है कि 2027 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव होने हैं। राजनीति में जनता की याददाश्त बहुत तेज होती है, खासकर तब जब बात रोजमर्रा की बुनियादी सुविधाओं की हो। त्योहारी सीजन में सड़कों की बदहाली से जूझती जनता के मन में भारी आक्रोश पनप रहा है। अगर नौकरशाही इसी तरह बेलगाम रही और जनता को धूल फांकनी पड़ी, तो यह लापरवाही आगामी चुनावों में धामी सरकार को बहुत महंगी पड़ सकती है।
अब कार्रवाई का इंतजार
अब पूरी जनता और विपक्ष की निगाहें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर टिकी हैं। देखना यह है कि अपनी ही दी गई डेडलाइन (1 नवंबर) के फेल होने और आदेशों को नजरअंदाज किए जाने के बाद, सीएम धामी लापरवाह अधिकारियों पर क्या एक्शन लेते हैं। क्या सच में जवाबदेही तय होगी, या यह चेतावनी भी फाइलों में दबकर रह जाएगी?

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Chief Editor, Aaj Khabar
