॰ दिल्ली से 17 फरवरी 2027 को होगा शताब्दी समारोह का शुभारंभ, कुमाऊं और गढ़वाल की लोकसंस्कृति, लोकगाथाओं व संगीत पर केंद्रित होंगे कार्यक्रम
New Delhi: उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और रंगमंच को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले सुप्रसिद्ध संगीतकार एवं सांस्कृतिक विभूति स्वर्गीय मोहन उप्रेती के शताब्दी वर्ष के अवसर पर वर्ष 2027 में दिल्ली से लेकर उत्तराखंड के विभिन्न शहरों तक अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पर्वतीय कला केंद्र, दिल्ली की ओर से आयोजित होने वाले इन कार्यक्रमों में गीत-संगीत, पारंपरिक वाद्ययंत्रों के वादन, लोकनृत्य, गीत-नाट्यों और संगोष्ठियों के माध्यम से उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया जाएगा। शताब्दी वर्ष के भव्य कार्यक्रमों का शुभारंभ 17 फरवरी 2027 को दिल्ली में किया जाएगा, जिसमें राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर की कला और संस्कृति से जुड़ी जानी-मानी हस्तियां शामिल होंगी।
स्वर्गीय मोहन उप्रेती भारतीय रंगमंच के प्रतिष्ठित संगीतकार होने के साथ-साथ लोकगायन और लोकसंगीत के क्षेत्र में भी विशिष्ट पहचान रखते थे। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में संगीत विधा के एसोसिएट प्रोफेसर एवं कार्यकारी निदेशक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच पर मंचित अनेक चर्चित नाटकों एवं गीत-नाट्यों को उन्होंने अपने संगीत से यादगार बनाया। लोकसंगीत के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू ने भी उन्हें ‘बेडू पाको बॉय’ नाम से संबोधित किया था।
वर्ष 1968 में स्वर्गीय मोहन उप्रेती के सानिध्य में पर्वतीय कला केंद्र की स्थापना की गई थी। वर्ष 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस संस्था का विधिवत उद्घाटन किया। इसके बाद संस्था ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1976 में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद संस्था के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वहीं, वर्ष 1977 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के भारत आगमन पर आयोजित स्वागत समारोह में भी स्वर्गीय मोहन उप्रेती के निर्देशन में संस्था के कलाकारों ने गीत-संगीत की प्रस्तुति दी थी।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, भारत सरकार की ओर से वर्ष 1970, 1983 और 1988 में पर्वतीय कला केंद्र के कलाकारों को स्वर्गीय मोहन उप्रेती के नेतृत्व एवं निर्देशन में विभिन्न देशों में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने का दायित्व सौंपा गया था। उन्होंने दुनिया के लगभग 22 देशों में गीत-संगीत और लोकगाथाओं पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत कर उत्तराखंड सहित देश की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से भारत और अन्य देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में भी योगदान मिला।
स्वर्गीय मोहन उप्रेती के संगीत निर्देशन में पर्वतीय कला केंद्र के कलाकारों ने कुमाऊं और गढ़वाल की लोकभाषाओं, लोकधुनों, लोकगीतों एवं पारंपरिक नृत्यों को मंच पर जीवंत किया। राजुला-मालूशाही, गंगनाथ, अजुवा बफौल, जीतू बगड़वाल, भाना गंगनाथ, रसिक रमौल, हरु-हीत, रामी, गोरीधना और हिल-जात्रा जैसी लोकगाथाओं एवं लोकपरंपराओं पर आधारित प्रस्तुतियों ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक पहचान दिलाई।
इसके अतिरिक्त गढ़वाल की पांडव जागर शैली पर आधारित महाभारत, उत्तराखंड की पारंपरिक रामलीला गायन शैली, अनेकता में एकता, गंगा अवतरण एवं उद्गम, लाल गुलाब, बसंती सांझ, वंदेमातरम, नौबत ऑफ कुमाऊं, इंद्रसभा, मेघदूत, सांझी विरासत और अमीर खुसरो सहित अनेक गीत-नाट्यों का हिंदी, संस्कृत और उर्दू में मंचन किया गया। इन प्रस्तुतियों में लोककथाओं, देशभक्ति, सांस्कृतिक समन्वय और भारतीय परंपराओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।
पर्वतीय कला केंद्र की प्रस्तुतियां दिल्ली के साथ-साथ देश के विभिन्न शहरों में आयोजित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सवों में भी मंचित हुईं। संस्था के कलाकारों ने अंतरराष्ट्रीय भारत रंग महोत्सव सहित अनेक प्रतिष्ठित आयोजनों में भाग लिया। इसके अलावा विश्व के विभिन्न देशों और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच से जुड़े प्रतिष्ठित ओलंपिक थियेटर में भी इन प्रस्तुतियों का मंचन किया गया।
शताब्दी वर्ष के अंतर्गत दिल्ली के साथ उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। अल्मोड़ा में मोहन उप्रेती लोक संस्कृति कला एवं विज्ञान शोध समिति के अध्यक्ष हेमंत जोशी, रानीखेत में संस्कृति कर्मी विमल सती, नैनीताल में जहूर आलम तथा देहरादून में हीरामणि ग्रुप की अध्यक्ष राखी रावत के सहयोग से कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जाएगी। इसके साथ ही उत्तराखंड के अन्य शहरों में स्थानीय सांस्कृतिक संस्थाओं के सहयोग से भी आयोजन किए जाएंगे।
दिल्ली में पर्वतीय कला केंद्र से जुड़े रहे पदाधिकारियों और कलाकारों के साथ उत्तराखंड की अनेक प्रमुख विभूतियां भी इन आयोजनों में सहयोग करेंगी। इनमें टीसी उप्रेती, संजय जोशी, नरेंद्र लडवाल, सुरेश पांडे, पीसी नैनवाल, रतन सिंह रावत, शेखर पाठक, सतीश टम्टा, रमा उप्रेती, दुर्गा सिंह भंडारी, पूरन चंद्र नैलवाल, डॉ. हरि सुमन बिष्ट, गणेश दत्त गौड़, मदन मोहन सती और दीवान सिंह बजेली सहित अन्य गणमान्य लोग शामिल हैं।
स्वर्गीय मोहन उप्रेती के शताब्दी वर्ष पर आयोजित होने वाले ये कार्यक्रम उनके सांस्कृतिक योगदान को स्मरण करने के साथ ही उत्तराखंड की लोकपरंपराओं, लोकसंगीत और रंगमंच की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेंगे। दिल्ली से 17 फरवरी 2027 को शुरू होने वाला यह आयोजन लोकसंस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार को समर्पित रहेगा।


Chief Editor, Aaj Khabar
