Dehradun: उत्तराखंड विधानसभा के विशेष सत्र में महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के समक्ष नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश की भौगोलिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विशिष्टताओं के साथ-साथ राज्य की चुनौतियों पर व्यापक रूप से अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड दक्षिण एशिया में एक विशिष्ट भौगोलिक प्रदेश है, जिसकी सीमाएं नेपाल और तिब्बत से मिलती हैं, और उत्तर में हिमालय देश की रक्षा में अडिग खड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रकृति ने इस राज्य को हिमालय की गोद में जन्मी जीवनदायिनी नदियों का आशीर्वाद दिया है, जिन्होंने न केवल भारत की धरती को सींचा बल्कि “गंगा-जमुनी संस्कृति” को भी जन्म दिया।
आर्य ने कहा कि उत्तराखंड की महिलाएं जंगलों को अपना मायका मानती हैं और “चिपको आंदोलन” इसका ऐतिहासिक उदाहरण है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड प्रकृति, संस्कृति और आस्था का संगम है — यहां बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री जैसे तीर्थों के साथ सिख और सूफी परंपरा की भी समृद्ध विरासत मौजूद है।
उन्होंने राष्ट्रपति से कहा कि उत्तराखंड जैसे राज्य में वन्यजीवों और मानव के बीच संघर्ष बढ़ रहा है, जबकि वनाधिकार कानून का लाभ अब तक राज्य के वनों पर आश्रित समुदायों तक नहीं पहुंच सका है। उन्होंने पलायन, बेरोजगारी, तकनीकी शिक्षा की कमी, औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को प्रदेश की प्रमुख समस्याएं बताया।
यशपाल आर्य ने कहा कि उत्तराखंड की महिलाएं खेतों से लेकर घर तक हर जिम्मेदारी निभा रही हैं, लेकिन पलायन और संसाधनों की कमी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि राज्य में तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए ताकि युवा आत्मनिर्भर बन सकें।
अंत में उन्होंने राष्ट्रपति मुर्मू से आग्रह किया कि वे अपने मार्गदर्शन और प्रेरणा से उत्तराखंड के विकास पथ को नई दिशा दें। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आपके मार्ग निर्देशन से जनहित में कार्य करेगी, यह हमारा विश्वास है।

Chief Editor, Aaj Khabar
