Haldwani: केंद्रीय बजट 2026 में सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र को लेकर कुछ सकारात्मक संकेत जरूर दिए हैं, लेकिन आम आदमी की रोजमर्रा की आर्थिक परेशानियों पर यह बजट अपेक्षित राहत देता नजर नहीं आता। देश इस समय कई गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। एक ओर फिस्कल डेफिसिट बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर रुपये का अवमूल्यन केवल डॉलर के मुकाबले ही नहीं, बल्कि एशियाई देशों की तुलना में भी चिंता का विषय बन चुका है। शेयर बाजार में अस्थिरता बनी हुई है और जीडीपी ग्रोथ पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ऐसे हालात में निर्यात बढ़ाना और भारतीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुंचाना बड़ी चुनौती है। ‘मेक इन इंडिया’ की अवधारणा धीरे-धीरे “असेंबलिंग इन इंडिया” तक सिमटती दिखाई दे रही है, जहां अधिकांश कल-पुर्जे आयात कर केवल जोड़े जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक समाधान मौलिक विनिर्माण को बढ़ावा देने और छोटे-छोटे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के विकेंद्रीकरण में है, न कि कुछ चुनिंदा बड़े कॉरपोरेट्स पर निर्भरता में।
बजट भाषण में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स विनिर्माण योजना के तहत परिव्यय बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ करने की घोषणा की गई है। दावा किया गया कि इस योजना में लक्षित से दोगुना निवेश प्राप्त हुआ है। हालांकि, असली परीक्षा इस बात की होगी कि यह राशि अनुसंधान, नवाचार और वास्तविक उत्पादन में लगती है या फिर केवल असेंबलिंग तक सीमित रह जाती है। इसी तरह, अगले पांच वर्षों में ₹10,000 करोड़ के परिव्यय से बायोफार्मा शक्ति योजना का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे जैविक दवाओं के क्षेत्र में नई संभावनाएं बन सकती हैं।
वेतनभोगी मध्यम वर्ग, जो प्रत्यक्ष कर के रूप में बजट में बड़ा योगदान देता है, इस बजट से खास राहत की उम्मीद कर रहा था। लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उसकी चिंताएं जस की तस बनी हुई हैं। निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत, बीमा प्रीमियम में वृद्धि और महंगाई से कम ब्याज दरें भविष्य की बचत को लेकर अनिश्चितता बढ़ा रही हैं। शेयर बाजार पर बढ़ते कर भार ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ाई है।
किसानों के लिए आय दोगुनी करने के पुराने वादों का जिक्र तो होता रहा, लेकिन इस बजट में उनके लिए कोई ठोस नई पहल सामने नहीं आई। वहीं, जीएसटी के जरिए रिकॉर्ड संग्रह में छोटे व्यापारियों की बड़ी भूमिका के बावजूद, उन्हें अनुपालन और दंडात्मक प्रावधानों से वास्तविक राहत मिलती नहीं दिख रही है।
रिटेल सेक्टर में अत्यधिक डी-रेगुलेशन और बड़े खिलाड़ियों के बढ़ते प्रभाव से स्ट्रीट वेंडर्स और छोटे दुकानदारों का भविष्य भी सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र को संतुलित संरक्षण नहीं मिला, तो रोजगार के मोर्चे पर सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
उत्तराखंड के लिए संभावनाएं
बायोफार्मा क्षेत्र में प्रस्तावित ₹10,000 करोड़ के निवेश से उत्तराखंड के जड़ी-बूटी और औषधीय पौधों से जुड़े उद्यमियों को लाभ मिलने की संभावना है। वस्त्र, हथकरघा और भेड़-पालन से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देने की घोषणाएं भी राज्य के लिए अवसर खोल सकती हैं। सोलर सिस्टम से जुड़े कल-पुर्जों को सस्ता करने के फैसले से उत्तराखंड में पहले से चल रही सौर परियोजनाओं को गति मिल सकती है। साथ ही, खेलो इंडिया कार्यक्रम के तहत खेल प्रतिभाओं के विकास पर जोर से पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों में उभरते खिलाड़ियों को नया मंच मिलने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, बजट में मैन्युफैक्चरिंग को लेकर इरादे तो दिखते हैं, लेकिन आम आदमी, मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों के लिए सीधी राहत अभी दूर ही नजर आती है।

Chief Editor, Aaj Khabar
