Dehradun: उत्तराखंड में सरकारी विद्यालयों में लगातार घट रही छात्र संख्या को लेकर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने राज्य सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में करीब 5 हजार सरकारी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें लगभग 4,275 प्राथमिक विद्यालय और 650 जूनियर हाईस्कूल शामिल हैं। कई विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या महज 1, 3 या 4 तक सिमट गई है।
यशपाल आर्य ने कहा कि सरकारी विद्यालय लगातार विद्यार्थियों से खाली हो रहे हैं, ऐसे में सरकार को शिक्षा की गुणवत्ता और नामांकन बढ़ाने के अपने दावों का जनता के सामने हिसाब देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि करीब 12 हजार करोड़ रुपये के वार्षिक शिक्षा बजट के बावजूद सरकारी स्कूलों की यह स्थिति क्यों बनी हुई है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि यह केवल छात्र संख्या में गिरावट का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा नीति, विद्यालय प्रबंधन, शिक्षकों की उपलब्धता, आधारभूत सुविधाओं और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने सरकार से पूछा कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों नहीं बढ़ रही है और कितने विद्यालयों में स्वीकृत पदों के मुकाबले शिक्षक कम हैं।
उन्होंने विद्यालयों में भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, प्रयोगशाला और डिजिटल सुविधाओं की स्थिति पर भी सरकार से जवाब मांगा। साथ ही यह जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की कि कितने शिक्षक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जा रहे हैं और पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए कितनी राशि खर्च की गई तथा उसका क्या परिणाम रहा।
आर्य ने कहा कि सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में कितने विद्यालय बंद, विलय या मर्ज किए गए और इन विद्यालयों के बंद या विलय के बाद संबंधित क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा व्यवस्था किस प्रकार सुनिश्चित की गई।
उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार कम छात्र संख्या के आधार पर विद्यालय बंद करेगी या पहले उन कारणों को दूर करेगी, जिनकी वजह से बच्चे सरकारी स्कूल छोड़कर निजी विद्यालयों की ओर जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, बेहतर सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी तो अभिभावकों का निजी स्कूलों की ओर जाना स्वाभाविक है। ऐसे में कम नामांकन को स्कूल बंद करने का आधार बनाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उससे पलायन होगा।
30 दिनों में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग
यशपाल आर्य ने सरकार से 30 दिनों के भीतर निम्न सूचनाएं सार्वजनिक करने की मांग की है—
- प्रदेश के प्रत्येक सरकारी विद्यालय की जिला एवं विद्यालयवार छात्र संख्या।
- 10 या उससे कम विद्यार्थियों वाले सभी विद्यालयों की विद्यालयवार सूची।
- पिछले पांच वर्षों में बंद, विलय अथवा मर्ज किए गए विद्यालयों का पूरा विवरण।
- प्रत्येक जिले में स्वीकृत और कार्यरत शिक्षकों की संख्या।
- जर्जर भवनों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित विद्यालयों की सूची।
- पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने पर खर्च की गई राशि और उसके परिणाम।
- गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए गए शिक्षकों का विवरण।
- कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए विद्यालयवार पुनर्जीवन योजना।
- स्कूल बंद या विलय करने के लिए निर्धारित मानकों और प्रक्रिया का विवरण।
उन्होंने कहा कि किसी भी विद्यालय को बंद या विलय करने के प्रस्ताव से पहले संबंधित ग्रामसभा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की राय लेने की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।
‘स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति बनाए सरकार’
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरकारी स्कूल गरीब, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। पर्वतीय उत्तराखंड में विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि गांव के सामाजिक अस्तित्व का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
उन्होंने कहा कि यदि करीब 5 हजार विद्यालय कम छात्र संख्या के कारण बंदी की स्थिति में पहुंच रहे हैं तो सरकार को यह बताना होगा कि पिछले वर्षों की शिक्षा नीतियों का मूल्यांकन किस स्तर पर किया गया और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय हुई। उन्होंने कहा कि केवल नई योजनाओं, मॉडल स्कूलों और घोषणाओं के जरिए सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गिरती स्थिति को नहीं छिपाया जा सकता।
आर्य ने मांग की कि सरकार स्कूल बंद करने से पहले ‘स्कूल बचाने की नीति’ घोषित करे। प्रत्येक कम-नामांकन वाले विद्यालय के लिए विशेष पुनर्जीवन पैकेज तैयार किया जाए, पर्याप्त और नियमित शिक्षक उपलब्ध कराए जाएं तथा जर्जर भवनों और मूलभूत सुविधाओं को समयबद्ध तरीके से दुरुस्त किया जाए।
उन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए स्थानीय जरूरतों के आधार पर अलग मॉडल विकसित करने, नामांकन बढ़ाने की योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन कराने और शिक्षा बजट के खर्च व परिणाम का सार्वजनिक सोशल ऑडिट कराने की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि स्कूल बंद या विलय करने से पहले अभिभावकों और ग्राम समुदाय को विश्वास में लेना जरूरी है।
यशपाल आर्य ने कहा कि जनता के पैसे से संचालित विद्यालय जनता के बच्चों के लिए हैं। सरकार की जिम्मेदारी बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाने की है, न कि बच्चों की संख्या घटने के बाद विद्यालयों को ही खत्म कर देना।
उन्होंने कहा कि अब सरकार को केवल बयान नहीं, बल्कि जवाब देना होगा। आंकड़े छिपाने के बजाय उनका पूरा हिसाब जनता के सामने रखना होगा और यदि शिक्षा नीति विफल हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।

Chief Editor, Aaj Khabar
