Dehradun: त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की निष्पक्षता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेशभर से लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही हैं कि कई जिलों में निर्वाचन अधिकारियों के रूप में अनुभवहीन और कनिष्ठ अधिकारियों की तैनाती की जा रही है, जिनके निर्णय ना केवल नियमों के विरुद्ध हैं, बल्कि स्पष्ट रूप से पक्षपातपूर्ण प्रतीत होते हैं।
विशेषज्ञों और नागरिकों की राय है कि पंचायत चुनावों में अक्सर ऐसे उम्मीदवार भाग लेते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि कमजोर होती है और उन्हें कानूनी प्रक्रिया की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। ऐसे में निर्वाचन अधिकारियों का निष्पक्ष और विधिसम्मत होना अनिवार्य है। लेकिन हाल के उदाहरण दर्शाते हैं कि ऐसा नहीं हो रहा।
उधम सिंह नगर का मामला: ब्लॉक काशीपुर की खरमासी सीट से अनुसूचित जाति की उम्मीदवार श्रीमती नर्मता का नामांकन इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उन्होंने मायके पक्ष का जाति प्रमाण पत्र लगाया, जबकि नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अनुसूचित जाति की महिलाओं की जाति उनके जन्मजात प्रमाण पर आधारित होती है। इसके बावजूद सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता एवं रिटर्निंग ऑफिसर अजय जॉन ने नियमों की अनदेखी करते हुए उनका नामांकन रद्द कर दिया।
रुद्रप्रयाग में सरकारी देनदारी पर छूट: एक अन्य मामला रुद्रप्रयाग से सामने आया, जहां ₹27 लाख की सरकारी देनदारी और न्यायालय द्वारा स्टे न मिलने के बावजूद एक प्रत्याशी का नामांकन स्वीकार कर लिया गया। आपत्तिकर्ताओं द्वारा स्पष्ट दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने के बावजूद रिटर्निंग ऑफिसर ने कोई विधिक सलाह नहीं ली और नामांकन स्वीकार कर लिया।
टिहरी में सात प्रत्याशियों का नामांकन खारिज: टिहरी जिले के अखोड़ी वार्ड से सात प्रत्याशियों का नामांकन बिना वैध आधार के रद्द कर दिया गया। इससे यह आशंका और गहराई है कि चुनावी प्रक्रिया में ताकतवर उम्मीदवारों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से निर्णय लिए जा रहे हैं।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि निर्वाचन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी और निष्पक्षता का उल्लंघन हो रहा है, जिससे लोकतांत्रिक प्रणाली की साख को गहरा आघात पहुंच सकता है।
मांग उठी है कि—
- संवेदनशील मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- नियमविरुद्ध निर्णय लेने वाले निर्वाचन अधिकारियों को हटाकर अनुभवी व वरिष्ठ अधिकारियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए।
- शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई कर चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता बहाल की जाए।
चुनाव लोकतंत्र की नींव होते हैं और यदि इन्हें संचालित करने वाले अधिकारी ही पक्षपात या नियमहीनता बरतें तो पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अतः राज्य निर्वाचन आयोग से अपेक्षा है कि वह शीघ्र निर्णय लेकर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करे।
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Chief Editor, Aaj Khabar

