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Visit of 16th Finance Commission to Uttarakhand: उत्तराखण्ड ने 16वें वित्त आयोग के समक्ष रखी अपनी विशेष वित्तीय मांगें, ‘इनवॉयरमेंटल फेडरलिज्म’ के तहत क्षतिपूर्ति की वकालत।

Visit of 16th Finance Commission to Uttarakhand: उत्तराखण्ड ने 16वें वित्त आयोग के समक्ष रखी अपनी विशेष वित्तीय मांगें, ‘इनवॉयरमेंटल फेडरलिज्म’ के तहत क्षतिपूर्ति की वकालत।
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Visit of 16th Finance Commission to Uttarakhand

देहरादून। उत्तराखण्ड सरकार ने सोमवार को सचिवालय में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष डॉ. अरविंद पनगढ़िया तथा आयोग के अन्य सदस्यों के समक्ष राज्य की वित्तीय जरूरतों, संरचनात्मक चुनौतियों और भौगोलिक-सामाजिक परिस्थितियों के आलोक में अपना पक्ष प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया। इस दौरान राज्य के अधिकारियों ने उत्तराखण्ड की संवेदनशील पारिस्थितिकी, सीमित संसाधन आधार और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को केंद्र में रखते हुए कई प्रमुख सुझाव आयोग के समक्ष रखे।

राज्य सरकार ने जोर देकर कहा कि उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय राज्य, जो देश के कुल वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा संरक्षित करते हैं, उन्हें “इनवॉयरमेंटल फेडरलिज्म” की भावना के अनुरूप क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए। प्रतिनिधिमंडल ने सुझाव दिया कि कर-हस्तांतरण (Tax Devolution) में वन आच्छादन के भार को वर्तमान की तुलना में बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक किया जाए। राज्य ने यह तर्क दिया कि जैवविविधता संरक्षण, जल स्रोतों की रक्षा और स्वच्छ पर्यावरण की उपलब्धता के लिए उत्तराखण्ड की भूमिका राष्ट्रीय महत्व की है, और इसके लिए उसे पर्याप्त वित्तीय सहयोग मिलना चाहिए।

बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि उत्तराखण्ड में हर वर्ष करोड़ों श्रद्धालु और पर्यटक विभिन्न धार्मिक एवं प्राकृतिक स्थलों का भ्रमण करते हैं। इस अस्थायी जनसंख्या या फ्लोटिंग पॉप्युलेशन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राज्य पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, विशेष रूप से स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता, आवागमन और कानून-व्यवस्था की व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखने में। राज्य ने मांग की कि इस विशिष्ट चुनौती को समझते हुए उसे विशेष वित्तीय सहायता दी जाए ताकि यात्रियों की संख्या के अनुपात में बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा सके।

उत्तराखण्ड सरकार ने कर-हस्तांतरण की प्रक्रिया में राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) को भी एक निर्णायक कारक बनाने की मांग की। राज्य ने आयोग से आग्रह किया कि जो राज्य वित्तीय प्रबंधन में अनुशासन दिखाते हैं, उन्हें डिवोल्यूशन फॉर्मूले में अतिरिक्त वरीयता दी जानी चाहिए। इससे राज्यों को दीर्घकालीन रूप से अपनी वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

इसके अतिरिक्त, उत्तराखण्ड ने यह महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया कि वर्तमान में लागू “रेवेन्यू डेफिसिट ग्रान्ट” (Revenue Deficit Grant) की जगह “रेवेन्यू नीड ग्रान्ट” (Revenue Need Grant) की अवधारणा अपनाई जाए। इसके पीछे तर्क यह था कि घाटा आधारित अनुदान प्रणाली राज्यों की वास्तविक जरूरतों को प्रतिबिंबित नहीं करती, जबकि ‘नीड बेस्ड’ प्रणाली के माध्यम से विकास की असमानताओं को बेहतर ढंग से दूर किया जा सकता है।

राज्य के अधिकारियों ने यह भी बताया कि उत्तराखण्ड प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील राज्य है, और इसके चलते आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास कार्यों पर बहुत अधिक खर्च होता है। इन स्थितियों में केंद्र से मिलने वाली सहायता अपर्याप्त रहती है, और यदि आयोग इन बिंदुओं को अपनी रिपोर्ट में शामिल करता है, तो राज्य को दीर्घकालिक राहत मिलेगी।

बैठक में डॉ. अरविंद पनगढ़िया ने राज्य द्वारा प्रस्तुत बिंदुओं को ध्यानपूर्वक सुना और आश्वासन दिया कि आयोग उत्तराखण्ड की भौगोलिक व पारिस्थितिकीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सिफारिशें तैयार करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य के विशेष योगदान, विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहर को बनाए रखने के प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

इस महत्वपूर्ण बैठक में राज्य सरकार ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि उत्तराखण्ड न केवल हिमालयी राज्य है, बल्कि देश के पारिस्थितिकीय संतुलन का प्रमुख आधार भी है। ऐसे में वित्त आयोग से विशेष सहयोग की अपेक्षा न्यायसंगत और आवश्यक है।

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