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Haridwar: हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर हरिद्वार से गूंजा नवजागरण का शंखनाद, राज्यपाल और पीटीआई संपादक ने रखे विचार

Haridwar: हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर हरिद्वार से गूंजा नवजागरण का शंखनाद, राज्यपाल और पीटीआई संपादक ने रखे विचार
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Haridwar: हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर प्रेस क्लब हरिद्वार द्वारा आयोजित भव्य समारोह ने पत्रकारिता के गौरवशाली अतीत को स्मरण कराने के साथ उसके भविष्य की स्पष्ट दिशा भी तय कर दी। कार्यक्रम में देश की प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी पीटीआई के संपादक श्री निर्मल पाठक और उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से.नि.) के विचारों ने समारोह को वैचारिक ऊंचाई प्रदान की।

पीटीआई के संपादक निर्मल पाठक ने कहा कि 1826 में पंडित किशन शुक्ल द्वारा आरंभ हुई हिंदी पत्रकारिता की यात्रा आज दो सौ वर्षों का स्वर्णिम अध्याय बन चुकी है। उन्होंने इसे गर्व का विषय बताते हुए कहा कि देशभर में हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पर इस तरह का आयोजन करने वाला प्रेस क्लब हरिद्वार एकमात्र संस्थान है। इसके लिए उन्होंने प्रेस क्लब हरिद्वार को साधुवाद दिया।

निर्मल पाठक ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं रही, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का सशक्त अस्त्र बनी। 1920 के बाद हिंदी अखबारों में आज़ादी के आंदोलन की स्पष्ट गूंज सुनाई देने लगी थी। उस दौर में पत्रकार ही स्वतंत्रता सेनानी थे और अखबार आंदोलन के हथियार। उन्होंने उस ऐतिहासिक विज्ञापन का उल्लेख किया, जिसमें संपादक की नौकरी के बदले सूखी रोटी, एक गिलास पानी और हर संपादकीय पर दस साल की जेल का उल्लेख था। यह उदाहरण हिंदी पत्रकारिता के त्याग, तपस्या और बलिदान को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि 1947 के बाद पत्रकारिता के सामने नई चुनौती थी—गरीबी, अशिक्षा, विस्थापन और सामाजिक विघटन से जूझते देश को दिशा देना। हिंदी पत्रकारिता ने सरकार से टकराव के बजाय राष्ट्र निर्माण में सहभागी भूमिका निभाई और समाज को जोड़ने का कार्य किया।

समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से.नि.) ने अपने वक्तव्य की शुरुआत “जय हिंद, जय हिंदी, जय हिंदी पत्रकारिता” के उद्घोष के साथ की। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष किसी एक संस्था की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक सभ्यता की तपस्या का परिणाम हैं। यह भारत की चेतना, संघर्ष और आत्मबल की दो सौ वर्ष की साधना है।

राज्यपाल ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने सत्ता से प्रश्न करना ही नहीं सिखाया, बल्कि समाज को स्वयं से प्रश्न करना भी सिखाया। यही किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है। उन्होंने पत्रकार को समाज का दर्पण, पथप्रदर्शक और प्रहरी बताते हुए कहा कि जब समाज भटकता है, तब पत्रकारिता दीपक बनकर रास्ता दिखाती है।

उन्होंने हरिद्वार को केवल तीर्थनगरी नहीं, बल्कि परिवर्तन की तपोभूमि बताते हुए कहा कि यहां से उठी पत्रकारिता की आवाज पूरे विश्व को दिशा दे सकती है। राज्यपाल ने कहा कि हिंदी भारत की आत्मा की भाषा है और जब आत्मा बोलती है, तो वह हिंदी में ही बोलती है। मां गंगा की भूमि से निकली आवाज कभी कमजोर नहीं हो सकती।

राज्यपाल ने भगवान शिव के त्रिशूल का उदाहरण देते हुए कहा कि राष्ट्र निर्माण और पत्रकारिता दोनों का धर्म है कि आध्यात्मिक उन्नति, सामाजिक समरसता और भौतिक विकास—तीनों का संतुलन बनाए रखा जाए। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता गांव, किसान, मजदूर, महिला, युवा और वंचित वर्ग की आवाज को राष्ट्रीय मंच देने वाली ताकत है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग पर बोलते हुए राज्यपाल ने कहा कि तकनीक की जड़ें भी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी हैं और संस्कृत व हिंदी जैसी भाषाओं में वह सामर्थ्य है, जो आने वाले समय में तकनीक की दिशा तय करेंगी। उन्होंने युवाओं से तकनीक से जुड़ने, लेकिन संस्कृति से न कटने का आह्वान किया।

समारोह ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि हिंदी पत्रकारिता केवल खबरों का संकलन नहीं, बल्कि समाज की चेतना की संरक्षक है। प्रेस क्लब हरिद्वार द्वारा आयोजित यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता के नवजागरण का शंखनाद बनकर सामने आया।

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