Haldwani: “उत्तराखंड राज्य के 25 साल: राज्य को क्या मिला?*
उत्तराखंड पृथक राज्य की अवधारणा के मूल मुद्दे:
• पहाड़ में रोज़गार के अवसर बढ़ें, ताकि रोज़गार के लिए होने वाला पलायन रुके।
• हिमालयी राज्य की पृथक संस्कृति के लिहाज़ से पहाड़ का भौगोलिक-सांस्कृतिक विकास, जिसमें पहाड़ की राजधानी पहाड़ में बने और जनप्रतिनिधि पहाड़ में सेवा करें, पहाड़ से जुड़े रहें, आम जनता के दुख-दर्द में साथ रहें।
• पहाड़ों में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आम जनमानस की अनिवार्य ज़रूरतें; मूलभूत मुद्दों पर कार्य।
• UP बड़ा राज्य है और उत्तराखंड की भौगोलिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के लिहाज़ से, हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए, हिमाचल, नॉर्थ ईस्ट जैसा भू-क़ानून, जिससे इस नाज़ुक ज़मीन पर भार न पड़े, प्राकृतिक संतुलन बना रहे।
इन मुद्दों और कुछ बेहतरी, अपने बच्चों को रोज़गार के लिए बाहर भेजने के दर्द से मुक्ति लेकर, और इसी तरह के सपने लेकर पूरा जनमानस सड़कों पर उतरा, गोलियाँ-लाठियाँ खायीं, मुज़फ़्फ़रनगर जैसे अमानवीय कृत्य झेले। हम सभी लोग उस आंदोलन के साक्षी रहे और अंततः 25 साल पहले पृथक राज्य बना।
पर क्या 25 साल बाद भी किसी मूल मुद्दे पर काम हुआ? उत्तराखंड देवभूमि है, न्यायभूमि; ईमानदारी से सच बताइए, क्या किसी भी मूल मुद्दे पर काम हुआ?
कुदरत ने इस ज़मीन को बहुत कुछ दिया; उसके दोहन, शोषण, उजाड़ने और कुछ ने उसमें अपने व्यक्तिगत हित के लिए उनका साथ देकर कुछ रेता, सरिया, सीमेंट, टिन, लोहा, लकड़ी, मिट्टी जोड़ ली होगी, कुछ काग़ज़ के टुकड़े जोड़ लिए होंगे—जो सब नश्वर हैं, यहीं रह जाना है। क्या इसके सिवा कुछ पाया?
पर क्या हमने इन 25 सालों में अपनी मातृभूमि—जिसे देवभूमि कहते हैं, जहाँ माता पार्वती का मायका कहते हैं, शिव का वास—उस मातृभूमि के लिए हमने ईमानदारी से क्या किया? ये सवाल सब अपने-अपने आपसे ईमानदारी से पूछिए। आपका घट, आत्मा, भीतर की आवाज़ कभी झूठ नहीं बोलती। पूछिए, हमने अपनी मातृभूमि-जन्मभूमि के लिए क्या किया?
उत्तराखंड विधानसभा भवन में लालकुआँ के विधायक मोहन दा की आत्मा जागृत हुई; उन्होंने कुमाऊँनी में बात की, गिर्दा की पंक्तियाँ बोलीं। काश सभी लोग इसी तरह आंदोलनकारियों, गिर्दा जैसी आवाज़ों के लिए गंभीर होते। विधायक हरीश धामी ने जो कहा, उसको कहने के लिए बहुत बड़ा हृदय चाहिए; उन्होंने ईमानदारी से सच कह डाला कि 25 साल में किसका भला हुआ? उससे आगे, भला-बुरा की गणित से दूर, आख़िर में हमने-अपने मूल, अपने को जवाब देना होता है कि हमने क्या किया? कितनी ईमानदारी से क्या कर्तव्य निभाया?
बाक़ी सब यहीं का था और यहीं रह जाएगा। वो सब तो जब हम नहीं थे तब भी ये सब यहीं था; जब हम न होंगे तो भी यहीं रहेगा।
बस आख़िर की बैलेंस शीट में केवल अपनी मातृभूमि के लिए ईमानदारी से क्या किया, वो क्रेडिट रह जाएगा।
चाहे आप आज जश्न मनाएँ या सवाल करें या फिर गूँगे-बहरे रोबोट बनाकर किनारे निकल लें।।।।।
अंततः आख़िरी सकारात्मक उम्मीद प्रकृति से है, हिमालय से है, जो प्राकृतिक संतुलन करता है। पर इस बार का संतुलन ऐसा हो जिसका प्रभाव मानव चेतना पर पड़े; पॉलिसी मेकर, आम जनमानस व्यक्तिगत स्वार्थ से उठकर राज्य की बेहतरी के लिए कार्य करें, जिससे राज्य की मूल अवधारणा पर पुनः काम हो।

Chief Editor, Aaj Khabar
